….क्यों हो गया वह आज इतना मजबूर ?

शीर्षक- मजदूर

एक इंसान जो कहलाता मजदूर,
क्यों हो गया वह आज इतना मजबूर ?

मांगी जिसने केवल अपनी मजदूरी ,
करके लाखों की ख्वाहिशें पूरी , आशियाना हमेशा दूसरों का बनाया ,
जी सके बेहतर जिंदगी इतना भी ना कमाया ।

आई जब विपदा भारी ,
और ना मिली कोई दिहाड़ी ,
खुद संग बच्चों के भी खाने के पड़ गए लाले ,
चला जब गांव अपने तो पैरों में पड़ गए छाले ।

किस्मत ने खेला कैसा अजब खेल ,
ना बस ,ना गाड़ी ,ना कोई रेल,
मिले कुछ मसीहा राह में,मदद जिन्होंने पहुंचाई,
पहुंचे कुछ घर को अपने, तो कुछ ने राह में ही जान गवाई ।

मिटा ना सके अगर भूख किसी की ,
और ना बचा सके अगर किसी की जान,
तो क्या फायदा हमारा होने का एक इंसान ? ?

बहुत ही द्रवित मन से
हेमंत की कलम से

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